Saturday, September 28, 2019

Happy Navratri 2019..

       
       
   सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके | 
   शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते ||

Today's Topic :- special "NAVRATRI 2019"

Hello..friends this is "ASHUTOSHTIWARI" again             

From, 

www.ashutoshtiwariamazing.blogspot.com

And you all are welcome to my amazing world in this special occasion of 
"NAVRATRI 2019".




First of all...


Happy Navratri 2019 to all my friends

So..let's..start with our special topic of Navratri..




who is "MAA DURGA", कैसे हुई मां दुर्गा की उत्पत्ति :-

"Maa Durga "or Adi Parashakti or Maha Kali or Bhavani are the different names given to the same Divine Shakti. She is the consort of Shiv. Maa Durga represents Power or Shakti or Energy of the Universe. She is Prakriti or Mother Nature. She is depicted as female because in the natural world the female gives birth to her children and plays the role of a Mother. Maa Durga is Jagdamba or Mother of the whole universe. Shiv is the cosmos while Shakti is His Energy. She is the other half of Shiv, Ardhnareshwar. Maa Durga is depicted to have 8 or 10 arms, each hand carrying a weapon or sacred item. Her vaahan or vehicle is a Tiger or Lion. Tiger represents unlimited power while Lion represents beastly desires. Her riding on a lion depicts She has conquered all beastly desires. She is the force/ energy behind Kundalini, the dormant energy coiled like a serpent at the base of the spine of every human.


Maa Durga has 9 forms or avatars, known as NavDurga.




दुर्गा हिन्दुओं की प्रमुख देवी हैं जिन्हें केवल देवी और शक्ति  भी कहते हैं। शाक्त सम्प्रदाय की वह मुख्य देवी हैं जिनकी तुलना परम ब्रह्म से की जाती है। दुर्गा को आदि शक्ति, प्रधान प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धितत्व की जननी तथा विकार रहित बताया गया है। वह अंधकार व अज्ञानता रुपी राक्षसों से रक्षा करने वाली तथा कल्याणकारी हैं। उनके बारे में मान्यता है कि वे शान्ति, समृद्धि तथा धर्म पर आघात करने वाली राक्षसी शक्तियों का विनाश करतीं हैं।[3]ॐ श्री दुर्गाय नम: देवी दुर्गा का निरूपण सिंह पर सवार एक निर्भय स्त्री के रूप में की जाती है। दुर्गा देवी आठ भुजाओं से युक्त हैं जिन सभी में कोई न कोई शस्त्रास्त्र होते है। उन्होने महिषासुर नामक असुर का वध किया। महिषासुर (= महिष + असुर = भैंसा जैसा असुर) करतीं हैं। हिन्दू ग्रन्थों में वे शिव  की पत्नी दुर्गा के रूप में वर्णित हैं। जिन ज्योतिर्लिंगों मैं देवी दुर्गा की स्थापना रहती है उनको सिद्धपीठ कहते है। वँहा किये गए सभी संकल्प पूर्ण होते है। 

नवरात्रि का प्रथम दिन : मां शैलपुत्री की कैसे करें पूजा, जानिए मंत्र और स्तोत्र

नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है। शैलीपुत्री हिमालय की पुत्री हैं। इसी वजह से मां के इस स्वरूप को शैलपुत्री कहा जाता है। इनकी आराधना से हम सभी मनोवांछित फल प्राप्त कर सकते हैं। मां शैलपुत्री का प्रसन्न करने के लिए यह ध्यान मंत्र जपना चाहिए। इसके प्रभाव से माता जल्दी ही प्रसन्न होती हैं और भक्त की सभी कामनाएं पूर्ण करती हैं।
पूजा विधि

सबसे पहले मां शैलपुत्री की तस्वीर स्थापित करें और उसके नीचे लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं। इसके ऊपर केशर से 'शं' लिखें और उसके ऊपर मनोकामना पूर्ति गुटिका रखें। तत्पश्चात् हाथ में लाल पुष्प लेकर शैलपुत्री देवी का ध्यान करें।

मंत्र इस प्रकार है-

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नम:।


मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड़ दें। इसके बाद प्रसाद अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें। इस मंत्र का जप कम से कम 108 करें।

मंत्र - ॐ शं शैलपुत्री देव्यै: नम:। 


मंत्र संख्या पूर्ण होने के बाद मां दुर्गा के चरणों में अपनी मनोकामना व्यक्त करके मां से प्रार्थना करें तथा आरती एवं कीर्तन करें। मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड़ दें। इसके बाद भोग अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें। यह जप कम से कम 108 होना चाहिए।








this video will help you. And explains you how to do Durga pooja in home




कैसे है शेरोवाली माँ दुर्गा इतनी शक्तिशाली ?


हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी दुर्गा , परमेश्वर ब्रह्मा (निर्माता) , विष्णु ( रक्षक ), और शिव ( विनाशक ) के संयुक्त ऊर्जा से उभरी है, राक्षस महिषासुर से युद्ध करने के लिए , कथा के अनुसार राक्षस महिषासुर को वरदान दिया गया था की वह और इंसान और भगवान द्वारा नहीं मारा जा सकता। यहां तक कि ब्रह्मा (निर्माता) , विष्णु ( रक्षक ), और शिव ( विनाशक ) ने भी उसे रोकने में नाकाम रहे ,इसलिए एक स्त्री ऊर्जा की उपस्थिति नरसंहार करने के लिए की गयी ,जिसने तीनो लोको में तहलका मचा दिया था-अर्थ , स्वर्ग और नीचे की दुनिया । देवी दुर्गा को सभी देवताओं द्वारा विभिन्न हथियार उपहार में दिए गए थे। जिसमें से भाला और त्रिशूल सबसे आम तौर पर उसके चित्रों में दर्शाया गया है ।वह सुदर्शन चक्र, तलवार , धनुष और तीर और अन्य हथियार पकड़े देखी गयी है ।

Where is "Maa Danteswari Temple in India" :-

यह chattisgarh जगदलपुर शहर से 84 किमी दूरी पर प्रसिद्ध स्‍थान है जहां स्‍थानीय देवी मां दंतेश्‍वरी का पवित्र मंदिर है, जिनकी पूजा शक्ति के अवतार के रूप में की जाती है। माना जाता है कि इस मंदिर में कई दिव्य शक्तियां निहित हैं। आसपास के गांवों और जंगलों से हजारों आदिवासी हर साल दशहरे पर देवी का पूजन करने यहां एकत्र होते हैं।


दंतेश्‍वरी मंदिर का निर्माण 14वीं सदी में चालुक्‍य के राजाओं ने दक्षिण भारतीय मंदिरों की वास्तुकला में बनवाया था। दंतेश्‍वरी माई की मूर्ति वहां गड़े हुए काले पत्थर की है।

मंदिर चार भागों में बंटा हुआ है जैसे गर्भ गृह, महामंडप, मुख्‍य मंडप और सभा मंडप। गर्भ गृह और महा मंडप का निर्माण एक ही पत्थर के टुकड़े से किया गया है। मंदिर के प्रवेश द्वार के सामने एक गरुड़ स्तंभ है। मंदिर में ही बड़े पैमाने पर दीवारों से घिरा एक विशाल आंगन स्थित है। शिखर मूर्तिकला से सुसज्जित है।



दंतेश्‍वरी मंदिर – दन्तेवाड़ा – एक शक्ति पीठ – यहाँ गिरा था सती का दांत

Maa Danteshwari Temple History & Story in Hindi :

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की हसीन वादियों में स्तिथ है, दन्तेवाड़ा का प्रसिद्ध दंतेश्‍वरी मंदिर।  देवी पुराण में शक्ति पीठों की संख्या 51 बताई गई है । जबकि तन्त्रचूडामणि में 52 शक्तिपीठ बताए गए हैं। जबकि कई अन्य ग्रंथों में यह संख्या 108 तक बताई गई है। दन्तेवाड़ा को हालांकि देवी पुराण के 51 शक्ति पीठों में शामिल नहीं किया गया है लेकिन इसे देवी का 52 वा शक्ति पीठ माना जाता है।  मान्यता है की यहाँ पर सती का दांत गिरा था इसलिए इस जगह का नाम दंतेवाड़ा और माता क़ा नाम दंतेश्वरी देवी पड़ा। 51 शक्ति पीठों की जानकारी और शक्ति पीठों के निर्माण कि कहानी आप हमारे पिछले लेख 51 शक्ति पीठ में पढ़ सकते है। दंतेश्‍वरी मंदिर शंखिनी और डंकिनी नदीयों के संगम पर स्तिथ हैं। दंतेश्‍वरी देवी  को बस्तर क्षेत्र की कुलदेवी का दर्ज़ा प्राप्त है। इस मंदिर की एक खासियत यह है की माता के दर्शन करने के लिए आपको लुंगी या धोति पहनकर ही मंदीर में जाना होगा।  मंदिर में सिले हुए वस्त्र पहन कर जानें की मनाही है।

मंदिर के निर्माण की कथा :

दन्तेवाड़ा शक्ति पीठ में माँ दन्तेश्वरी के मंदीर का निर्माण कब व कैसे हूआ इसकि क़हानी कुछ इस तरह है। ऐसा माना जाता है कि बस्‍तर के पहले काकातिया राजा अन्‍नम देव वारंगल से यहां आए थे। उन्‍हें दंतेवश्‍वरी मैय्या का वरदान मिला था। कहा जाता है कि अन्‍नम देव को माता ने वर दिया था कि जहां तक वे जाएंगे, उनका राज वहां तक फैलेगा। शर्त ये थी कि राजा को पीछे मुड़कर नहीं देखना था और मैय्या उनके पीछे-पीछे जहां तक जाती, वहां तक की ज़मीन पर उनका राज हो जाता। अन्‍नम देव के रूकते ही मैय्या भी रूक जाने वाली थी।


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